::: दहेज़ पर गढ़वाली कविता :::

    Anup Singh Rawat
    By Anup Singh Rawat

    5/5 stars (2 votes)

    ::: दहेज़ पर गढ़वाली कविता :::

    कनु फैल्युं च समाज मा, यु निर्भे दहेज़ कु रोग ।
    नि लेणु-देणु दहेज़ कतै, झणी कब समझला लोग।।

    बेटी का होंद ही बाबाजी, जुडी जांदा तैयारी मा ।
     सुपिन्यां सजाण लग्यान, अपरू मुख-जिया मारी का ।।

    कखि जु नि दे सकुणु क्वी, ता आग, फांसी लगणी चा ।
    फूलों सी पाली लाड़ी बेटी, ज्यूंदी ही वा म्वरिणी चा ।।

    शिक्षित छावा तुम लोग सभ्या, फिर भी नि समझणा छावा ।
    यु रोग ता आग सी भब्कुणु, भलु नि चा यु यैथे बुझावा ।।

    ब्वारी किलै बेटी नि समझेणी च, एक सासू किलै माँ नि बनिणी चा।
    घर की लक्ष्मी किलै आजकल, इनि किलै ये युग मा सतैणी चा ।।

    कब तक चलुदु रालू यु खेल, आवा चला येथें बंद करी दयोंला ।
    रावत अनूप बोलणु सभ्युं से, आज नई शुरुआत करी दयोंला ।।


    © अनूप रावत "गढ़वाली इंडियन" ग्वीन, बीरोंखाल, गढ़वाल (उत्तराखंड)

    Latest comments

    No comments

    Today's Deals: Great Savings Booking.com Booking.com