गढ़वाली मुहावरे व लोकक्तियाँ

घी ख्त्यो बोड्यु मा। 
घी गिरा पर बर्तन में।
[भावार्थ- हानि जैसा होने पर भी हानि ना होना]

 जुवों कि डारा घाघरू नि छोड़ेन्दो।  
जुवों कि डर से घाघरा नहीं छौड़ा जाता।
[भावार्थ- सभी कुछ अनुकूल नहीं होता, कुछ प्रतिकूल होने पर भी त्याग नहीं किया जाता]

कितुला कु नाग अर बिरला को बाघ। 
केंचुवे को नाग और बिल्ली को बाघ।
[भावार्थ- भारी भरम हो जाना]

नाक-कटी हाथ मा धरयुंच।
नाक काट के हाथ में रखा हुवा है।
[भावार्थ- मान-सम्मान ताक पर रखकर बेशर्म हो जाना]

पैले बूड गितांग छै अब नाती जि होयुंच।  
पहले से बूढ़ा गायाकर था अब पोता जो हो रखा है।
[भावार्थ- विशेष खुशी प्राप्त होने पर अति उत्साह प्रदर्शित करना]

ढूगा मा धैर्याल।  
पत्थर में रख दिया।
[भावार्थ- त्याग देना]

तातो दूध न घुटेन्द न थूकेंन्द.  
गर्म दूध न पिया जाता न थूका जाता।
[भावार्थ- असमंजस में या अस्थिर रहना]

घुन्डू घुन्डू फुकेगे, कुतराण अब आयी।  
घुटनों तक जल गया बदबू अब आयी।
[भावार्थ- नितांत लापरवाह होना]

भ्वीं मा खुटो नि धरेन्दा।  
जमीन पर पांव नहीं रखा जाता।
[भावार्थ - अत्यंत हर्षित होना]
 

जाण न पछ्याँण, भक्क अग्वाड़। 
जान न पहचान सीधे गले मिलना।
[भावार्थ - बिना सोचे समझे किसी से अधिक परिचय नहीं बढ़ाना चाहिए]

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