सर्दियों में लें पारंपरिक खानपान का जायका, स्‍वाद के साथ पौष्टिकता से लबरेज

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    सर्दियों में लें पारंपरिक खानपान का जायका, स्‍वाद के साथ पौष्टिकता से लबरेज
    पहाड़ी खान-पान की विशेषता यह भी है कि यहां खाना बनाने के लिए लोहे की कढ़ाई का इस्तेमाल ज्यादा किया जाता है। इससे खाना स्वादिष्ट होने के साथ ही पौष्टिकता से लबरेज होता है।

     

    देहरादून, दीपिका नेगी। उत्तराखंड में स्वादिष्ट एवं विविधता युक्त खानपान की समृद्ध संस्कृति रही है। यहां की महिलाएं एक ही खाद्यान्न से भांति-भांति के व्यंजन बनाने में बेहद निपुण हैं। पहाड़ी खान-पान की एक विशेषता यह भी है कि यहां खाना बनाने के लिए लोहे की कढ़ाई का इस्तेमाल ज्यादा किया जाता है। इससे खाना स्वादिष्ट होने के साथ ही पौष्टिकता से लबरेज होता है। पहाड़ की संस्कृति में सर्दियों के दौरान हल्के, सुपाच्य और गर्म तासीर वाले खास खान-पान को विशेष तवज्जो दी जाती है। यह लजीज होने के साथ ही शरीर को भी काफी मात्रा में ऊर्जा देता है। आइए! पहाड़ी खान-पान में शामिल कुछ खास तरह की डिशेज से आपका परिचय कराते हैं।

    थिंच्वाणी

    उत्तराखंड के पारंपरिक खान-पान में 'थिंच्वाणी' स्वादिष्ट और सुपाच्य भोजन की श्रेणी में आता है। यह आलू और मूला (पहाड़ी मूली) से तैयार किया जाता है। थिंच्वाणी झटपट तैयार होने वाला लजीज साग है, जिसे भात और झंगोरा के साथ खाया जाता है। इसमें लगने वाले जख्या के तड़के का कोई जवाब नहीं है। इससे थिंच्वाणी का स्वाद दोगुना हो जाता है। आयुर्वेदिक चिकित्सक डॉ. नवीन जोशी बताते हैं कि थिंच्वाणी पेट के लिए बेहद लाभकारी होता है। सर्दियों में मूला का थिंच्वाणी शरीर को गर्म रखता है। पहाड़ों में आलू और मूला को मिक्स कर भी इसे तैयार किया जाता है।

    आलू का थिंच्वाणी बनाने के लिए आलू को छील कर उसे सिल पर थींचा (कूटा) जाता है। लोहे की कढ़ाई में तेल में जख्या, लहसुन, प्याज और टमाटर डालकर इसे भूना जाता है। फिर जरूरत के हिसाब से नमक, मिर्च, मसाले डालकर पकने के बाद पानी डालकर दोबारा थोड़ी देर तक पकाया जाता है। थिंच्वाणी को गाढ़ा करने के लिए इसमें गेहूं का आटा भी डाला जाता है। मूला का थिंच्वाणी भी इसी तरह तैयार किया जाता है। हां! मूला का थिंच्वाणी तैयार करते समय इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि मूला को ज्यादा भूनें नहीं, अन्यथा उसका स्वाद कसैला हो जाएगा। 

    चैंसू

    चैंसू उड़द और गहथ की दाल से तैयार किया जाता है। इसे बनाने के लिए पहले दाल को सिल पर दरदरा (मोटा) पीसा जाता है। हालांकि, अब सिल की जगह मिक्सी ने ले ली है, लेकिन यह सिल के स्वाद का मुकाबला नहीं कर सकता। इस दाल को लोहे की कढ़ाई में जीरा, लहसुन, प्याज और टमाटर के साथ इसे भूना जाता है। खुशबू आने के बाद उसमें बाकी मसाले मिलाए जाते हैं और फिर गर्म पानी डालकर उसे कुछ देर पकने दिया जाता है। चैंसू को मंडुवे की रोटी, भात (चावल) के साथ खाया जाता है। सर्दियों में गहथ का चैंसू ज्यादा खाया जाता है।

     

    काफली

     

    इसे कुमाऊं में काप या कापा और गढ़वाल में धबड़ी बोला जाता है। पहाड़ी पालक से बनने वाला यह व्यंजन यूं तो साग की तरह बनता है, लेकिन इसमें पालक के पत्तों को पूरी तरह मैश न करके सामान्य ही रखा जाता है। इसके लिए पालक को अच्छी तरह धोकर तब तक उबाला जाता है, जब तक कि वह पूरी तरह पक न जाए। जायका बढ़ाने के लिए इसमें बेसन या गेहूं का आटा भी मिलाया जाता है। तासीर गर्म होने के कारण सर्दी के मौसम में यह गढ़वाल-कुमाऊं का एक पारंपरिक एवं लोकप्रिय व्यंजन है।

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