क्यों छोड़ा था तूने अपना ये गाँव जरा लिखना

क्यों छोड़ा था तूने अपना ये गाँव जरा लिखना
शहर जाकर ऐ मेरे दोस्त अपना पता लिखना
क्यों छोड़ा था तूने अपना ये गाँव जरा लिखना
क्या अब स्वाद नही रहा चूल्हे में बनाई मढुवे की रोटी में
क्यों खफा हुआ इस आबो हवा से जरा लिखना
माना के चंद कागज़ के टुकड़े की कमी थी यहाँ पर
मिल जाए गर सुकून मेरे गावों जैसा जरा लिखना
कहने को होंगे बहुत से खजाने कुबेर के तेरे शहर मैं
मिल जाए मिटटी में खुशबु यहाँ जैसी जरा लिखना
यंहा रोज़ लड़ता था माँ से, बात-बात पे बिगड़ता था !
पड़ी वो मार चिमटे व शिशूण की आये जो याद जरा लिखना
सुना है बहुत सलीका है तेरे शहर में जिंदगी जीने का
सो सके चैन की नींद जिस दिन वहां पर जरा लिखना
खान पान के मिलेंगे बहुत तरीके शहर में नए नए
बुझा सके प्यास धारे व नौले के नीर जैसी तो जरा लिखना
कहते है बड़ी मन लुभावन होती है शहर की चकाचौंध
दिये सी उभरती परछाई तू देख सके, तो जरा लिखना
वैसे तो हमदर्द बहुत होंगे तेरे इर्द गिर्द तुझे सँभालने को
मिल जाए वफ़ादार तेरे घर के पशुओ जैसा जरा लिखना
वैसे तो भीड़ बहुत होगी तेरे शहर में अनजाने लोगो की
मिल जाए वहां कोई दिलदार मुझ सा, तो जरा लिखना
यूँ तो रहोगे मशगूल बहुत अपने आपमें भूलकर सब कुछ
कभी तन्हाई में आये याद इस यार की, तो जरा लिखना
शहर जाकर ऐ मेरे दोस्त अपना पता लिखना
क्यों छोड़ा था तूने अपना ये गाँव जरा लिखना ......!! —

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